कबन्ध ने जब बड़े चतुराई भरे शब्दों में भगवान से कहा - महाराज ! दुर्वासा तो इतने बड़े क्रोधी हैं कि उन्होंने मुझे शाप दे दिया और आप इतने सज्जन हैं कि आपने मुझे सद्गति दे दी । कबन्ध मानो यह कहना चाहता था कि दुर्वासा ब्राह्मण होकर भी बड़े क्रोधी हैं । कबन्ध की दृष्टि में दोष दर्शन है । परन्तु भगवान श्रीराघवेन्द्र ने तुरन्त उसको फटकारते हुए कहा कि अरे कबन्ध ! ब्राह्मण चाहे फटकारे, चाहे शाप दे, चाहे कैसे भी बोले, पर वह पूज्य है । अब आजकल लोग पढ़ते हैं तो कहते हैं कि ब्राह्मणवाद का इतना समर्थन ? पर उस वाक्य के पीछे भगवान राम का अभिप्राय मानो यह था कि दुर्वासा के अवगुण तो तू देख रहा है, पर दुर्वासा के जीवन में जो तप है, त्याग है, गुण है, जो विशेषताएँ हैं उन पर तेरी दृष्टि नहीं जा रही है । भले ही उनमें क्रोध की मात्रा कुछ अधिक है पर शाप के पीछे तुम्हारी अमर्यादा ही तो मुख्य कारण है । कबन्ध का जो वर्णन किया गया है उसमें बड़ी सांकेतिक भाषा निहित है । कहा जाता है कि कबन्ध के शरीर में सिर के नीचे वाला सब भाग था, केवल सिर नहीं था । इसका अभिप्राय है कि यद्यपि संसार में यह जो शरीर की रचना हुई है उसके अनुसार एक व्यक्ति के शरीर में सिर भी चाहिए, ह्रदय भी चाहिए, भुजा भी चाहिए और चरण भी चाहिए तथा चारों में ही स्वस्थता भी होनी चाहिए । पर अगर कोई व्यक्ति ऐसा मिल जाय जो कहे कि मैं तीन से ही काम चलाऊँगा, चौथा नहीं चाहिए तो इसका अर्थ है कि उसके अन्तःकरण में उस चतुर्थ अंग के प्रति विद्वेष भरा हुआ है । चतुर्वर्ण के अनुसार सिर ब्राह्मण का प्रतीक है । पर कबन्ध के शरीर में सिर नहीं था । इसका अभिप्राय है कि ब्राह्मण के प्रति उसके अन्तःकरण में अत्यंत विद्वेष बुद्धि भरी हुई थी । इसलिए भगवान राम बाँटकर कहते हैं - नहीं, नहीं ब्राह्मण तो हर तरह से पूज्य है । ब्राह्मण की पूज्यता की बात भगवान उसके अन्दर की जो द्वेष बुद्धि है, द्वेष वृत्ति है, उसको मिटाने के लिए कहते हैं ।
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