कभी हम और आप शरीर में स्थित होते हैं, कभी मन में स्थित हो जाते हैं । कहीं-कहीं यह दृश्य मुझे दिखायी देता है कि श्रोता कथा में आया हुआ है पर अचानक वह नींद लेने लगता है । इसका अर्थ है कि उस समय वह शरीर में चला गया । क्योंकि अगर मन से बैठा हुआ होता तो उसे नींद नहीं आती । जब मन नहीं लगता है तो शरीर का जो तमोगुण है वह इस पर अधिकार कर लेता है । इसका अभिप्राय है कि हम कभी शरीर में स्थित होते हैं और कभी मन के रस में डूब जाते हैं । बुद्धि से विचार करने की प्रवृत्ति भी कई व्यक्तियों के जीवन में उदित होती है । कई व्यक्तियों में तीव्रतम अहंकार का उदय होता हुआ भी दिखाई देता है । फिर ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति के लिए क्या यह निर्णय करना सरल है कि वस्तुतः मेरा परिचय क्या है ? भगवान श्रीराघवेन्द्र तथा महर्षि भरद्वाज के संदर्भ से इसका जो उत्तर दिया गया है उस पर हमें विचार करना चाहिए ।
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