Saturday, 25 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

कबन्ध एक विद्वेषी व्यक्ति था पर ऐसा नहीं कि भगवान उसका हित नहीं करते हैं । प्रभु तो उसका भी कल्याण करते हैं, पर कल्याण करने में अन्तर है । कबन्ध के ऊपर भगवान बाण का प्रयोग करते हैं । प्रभु जब देखते हैं कि यहाँ मीठी दवा से लाभ होने वाला नहीं है तो पहले कड़वी दवा का प्रयोग करते हैं और उसके पश्चात कबन्ध के अन्तःकरण का जो विद्वेष है उसे मिटाने के लिए ब्राह्मण की महिमा प्रतिपादित कर देते हैं । परन्तु शबरी जी के संबंध में प्रभु जानते हैं कि यह जात्याभिमान से शून्य परम भक्तिमति हैं, इसलिए भगवान राम वहाँ पर भक्ति की महिमा का गायन करते हैं । और इसी तरह हनुमान जी से भगवान राम का जो वार्तालाप हुआ उस पर भी आप जरा ध्यान दीजिए । फिर सुग्रीव से मिलन के पश्चात सुग्रीव को भगवान राम ने जो उपदेश दिया उस पर यदि विचार करेंगे तो आपको वहाँ पर भी यही दिखायी देगा कि उन दोनों पात्रों को दिये गये उपदेश एक-दूसरे से भिन्न हैं ।

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