Monday, 13 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

व्यावहारिक संदर्भ में संबंधों की विभिन्नता को लेकर कभी-कभी कठिनाई उत्पन्न हो जाती है । जैसे शास्त्र का एक आदेश है कि माँ की आज्ञा माननी चाहिए । यद्यपि यह बात तो बड़ी सीधी सी लग रही है । अगर माता-पिता दोनों की आज्ञा एक हो तब तो निश्चय करना बड़ा सरल हो जाता है कि माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए । पर अगर माता और पिता दोनों की आज्ञा में टकराहट हो जाय तो फिर व्यक्ति दोनों में से किसकी आज्ञा को माने ? अब यदि शास्त्रों को ढूँढ़िये तो उसमें परस्पर इतने विरोधी वचन मिलते हैं कि जो एकाध श्लोक पढ़ लेते हैं वे भ्रम में पड़ जाते हैं । क्योंकि शास्त्र में जहाँ पिता के महत्व का वर्णन किया गया है, वहाँ यदि यह कहा गया है कि पिता का स्थान सर्वोच्च है, तो जहाँ माता की महिमा का वर्णन किया गया है वहाँ माँ को शीर्ष पद दिया गया है । श्रीरामचरितमानस में दोनों ही प्रकार के दृष्टांत आपको मिलेंगे ।

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