Monday, 20 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान ने जब कबन्ध को गति दी तो वह लगा भगवान की प्रशंसा करने । यद्यपि प्रशंसा करना तो अच्छी बात है, पर अगर सद्भाव से हो तो । लेकिन कई लोग जब एक की प्रशंसा करेंगे तो दूसरे की निन्दा यह कहकर अवश्य करेंगे कि आप तो बड़े सज्जन हैं पर वह तो बड़ा बुरा है । इसका अभिप्राय है कि वह यह समझता है कि इनकी प्रशंसा के साथ-साथ हम जब दूसरे की निन्दा करेंगे तो इनकी प्रसन्नता और अधिक बढ़ जायेगी । और कुछ लोगों की प्रसन्नता दूसरों की तुलना में प्रशंसा सुनकर सचमुच बढ़ भी जाती है । कबन्ध ने यदि केवल भगवान राम की प्रशंसा ही की होती कि आप बड़े उदार हैं तब तो वह सर्वथा उचित प्रशंसा थी । पर कबन्ध ने बड़ी चतुराई भरे शब्दों में भगवान से कहा कि - महाराज ! दुर्वासा तो इतने बड़े क्रोधी हैं कि इन्होंने मुझे शाप दे दिया और आप इतने सज्जन हैं कि आपने मुझे सद्गति दे दी । और जब भगवान राम ने कबन्ध का यह शब्द सुना तो तुरन्त भगवान राम समझ गये कि यह कहाँ अटका हुआ है । और इसके मन में जो संस्कार है उसको यहाँ से हटाना चाहिए । इसलिए उसकी स्थिति को समझकर भगवान ने जो वाक्य कहा वह केवल कबन्ध के लिए है । हाँ ! अगर आप में से कोई कबन्ध हो तो उसे सही ही माने । लेकिन अगर आप कबन्ध नहीं हैं तो आपको चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है ।

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