सुग्रीव जब भगवान राम के समक्ष बहुत ऊँची भाषा बोलने लगे, भगवान को लगा कि मित्र इतनी ऊँची उड़ान पर पहुँच गया है । और प्रभु को यह सोचकर हँसी आयी कि मैं तो ऊपर से उतर कर नीचे आ गया और यह नीचे से ऊपर चला गया । अब भला बराबरी कैसे बनेगी ? या तो जब मैं ऊपर था तब यह ऊपर आ जाता, तब हम दोनों की बराबरी हो जाती, अथवा जब मैं इसके स्तर पर उतर आया तो यह भी यहीं पर रहता । सुग्रीव भगवान से कहते हैं कि शत्रु-मित्र का भेद मिथ्या है, वस्तुतः यह तो धृष्टता की पराकाष्ठा है । क्योंकि भगवान तो सर्वज्ञ हैं, क्या उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है ? इसलिए गोस्वामीजी ने लिखा कि - बन्दर की वैराग्य भरी वाणी सुनकर भगवान हँसे । मानो व्यंग्य यह था कि जैसे बन्दर एक डाली से दूसरे डाली पर चला जाता है, उसको समझने वाला व्यक्ति जानता है कि यह तो बन्दर की छलांग है । इसी तरह आज सुग्रीवरूपी बन्दर की छलाँग जरा लम्बी लग गयी, अयोध्याकाण्ड में लक्ष्मण जी भी यही कहते हैं कि प्रभु ! मैं किसी को नहीं जानता और यहाँ पर सुग्रीव कहते हैं कि यह सब कुछ नहीं है । किन्तु भगवान श्रीराम मुस्कराकर कहते हैं - मित्र ! तुमने तो बहुत बढ़िया बात कही है, पर मेरी भी बात झूठी नहीं होगी । सुग्रीव ने इसका सही अर्थ नहीं लिया । उन्होंने कहा - प्रभु ! लगता है आपको अपने सत्य की चिन्ता हो गयी है कि अगर आप बालि को नहीं मारेंगे तो आपका वचन झूठा हो जायेगा, और अगर आपको अपना सत्य बचाना हो तो बालि से विरोध कीजिए, मेरे मन में तो ज्ञान हो गया है, वैराग्य हो गया है । इसीलिए भगवान ने थोड़ा सा खेल करके दिखा दिया कि तुम तो नकली बात बोल रहे हो ।
......आगे कल .....
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