Sunday, 30 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम की जो यात्रा है, उसमें प्रभु ने दो रूपों में अपने आप को अभिव्यक्त किया है । एक ओर तो भगवान राम साक्षात ईश्वर हैं और दूसरी ओर वे मानवीय लीला संपन्न कर रहे हैं । इस यात्रा के क्रम में प्रभु पहले चारों विद्यार्थियों के पीछे चलते हैं । आध्यात्मिक अर्थों में इस पर यदि दृष्टि डालें कि यह चारों विद्यार्थी कौन हैं ? तो उनका एक दूसरा रूप ही हमें दिखायी देगा । महर्षि भरद्वाज जब अपनी पाठशाला के विद्यार्थियों से पूछते हैं कि आप लोगों में से मार्ग जानने वाला कौन है ? तो पचासों विद्यार्थी यह दावा करते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है - अब यह पचासों शब्द भौतिक अर्थों में बहुसंख्यक है, कि बहुत से विद्यार्थियों ने ऐसा कहा । और आध्यात्मिक अर्थों में इसका तात्पर्य है कि महर्षि भरद्वाज के आश्रम में विद्यार्थियों के रूप में जो दिखायी दे रहे हैं, वस्तुतः वे हमारे विविध धर्मग्रंथ ही हैं । और ये जितने हमारे धर्मग्रंथ हैं, उनको आप पचास के रूप में देख सकते हैं । अठारह पुराण, अठारह स्मृतियाँ, दस उपनिषद और चार वेद । इस तरह मानो हमारे पचास धर्मग्रंथ ही मूर्तिमान होकर आग्रह कर रहे हैं कि इन सबके मन में भगवान राम के प्रति प्रेम भी है ।

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