Saturday, 29 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

वर्णन आता है कि एक बार भगवान कृष्ण माखन चुराकर भाग रहे थे । और जिस गोपी के घर से मक्खन चुराया था वह पकड़ने के लिए दौड़ रही थी । एक भक्त ने उनको भागते देखा तो तुरन्त कहा - प्रभु ? रुकिये, रुकिये ? भगवान ने कहा देख नहीं रहे हो, पीछे गोपी पकड़ने के लिए आ रही है, और तुम रुकने के लिए कह रहे हो ? तो भक्त ने कहा कि, आप कहाँ जायेंगे भागकर ? कहीं न कहीं तो जाकर छिपेंगे ही । और प्रभु ! इस बात का अवश्य ध्यान रखियेगा कि अँधेरे में ही छिपियेगा, उजाले में मत छिपियेगा । क्योंकि उजाले में छिपने से पकड़ जाइयेगा । फिर अन्त में धीरे से भक्त ने कहा - महाराज ! अगर अँधेरे में ही छिपना है तो फिर मेरे ह्रदय के अँधेरे में ही आकर छिप जाइयेगा  क्योंकि यहाँ से बढ़कर अँधेरा आपको कहीं नहीं मिलेगा । गोस्वामीजी का अभिप्राय है कि उस युग के लोगों ने भगवान राम को जाग्रत अवस्था में देखा, वे तो धन्य हैं ही, क्योंकि त्रेतायुग प्रकाश का युग है । पर अगर हम लोग अन्धकार के युग में हैं, रात्रि के युग में हैं, तब हम तो प्रभु से और भी लाभ ले सकते हैं । उनसे कह सकते हैं प्रभु ! उस युग में तो आप चले, पर यह तो अँधेरी रात्रि का युग है और रात्रि को तो विश्राम चाहिए, इसलिए आइये इस तमोमय अन्तःकरण में बस कर विश्राम कीजिए ।

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