गोस्वामीजी कहते हैं कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम, श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मणजी इन तीनों पथिकों को वनमार्ग में चलते हुए जिन्होंने देखा, उन सभी ने बिना परिश्रम के बड़े ही आनन्द से इस संसार पथ को पार कर लिया । पर इतना कहने के बाद गोस्वामीजी को लगा कि हमारे युग के लोग तो इसे पढ़कर निराश हो जायेंगे । क्योंकि जब वे यह पढ़ेंगे कि जिन लोगों ने पथिक राम को चलते देखा उन्होंने संसार पथ को सरलता से पार कर लिया, तब उन्हें ऐसा लगेगा कि भई ! हम उतने सौभाग्यशाली नहीं हैं । क्योंकि यदि हम भी उस युग में होते तो उन पथिकों के दर्शन करके संसार पथ को सरलता से पार कर लेते । इसलिए हम तो केवल पुरानी स्मृति के रूप में ही इसका आनन्द ले सकते हैं । किन्तु इस यात्रा से हमारी समस्या का समाधान नहीं होगा । इसलिए गोस्वामीजी ने तुरन्त आश्वासन देते हुए अगली पंक्तियाँ जो कहीं, वे हमारे और आपके लिए बड़े काम की है । उन पंक्तियों का पहला शब्द है *अजहुँ* 'अब भी' । मानो उस युग के जिन लोगों ने दर्शन किया, उन्होंने तो लाभ लिया ही, पर आज भी जिनके ह्रदय में सपने में भी लक्ष्मण, सीताजी और श्रीराम यह तीनों पथिक बसे हुए हैं, वह व्यक्ति भगवान राम के धाम के पथ को सरलता से प्राप्त कर लेगा ।
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