Monday, 10 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान श्रीराघवेन्द्र कहते हैं कि नीति और प्रीति में जो विरोध दिखायी देता है, वह वास्तविक नहीं होता । अगर ऐसा हो तो व्यक्ति का जीवन या तो प्रीतिरहित होगा या नीतिरहित होगा । इसी तरह से परमार्थ और स्वार्थ भी विरोधी नहीं है । भगवान राम अपने चरित्र के द्वारा यह बताते हैं कि नीति - प्रीति तथा परमार्थ और स्वार्थ परस्पर विरोधी माने जाने वाले ये गुण भी वास्तव में एक-दूसरे के पूरक हैं । इसलिए भगवान राम ने विभीषण के सन्दर्भ में इन चारों को यथार्थ करके दिखा दिया । अगर हम गहराई से विचार करके देखें तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भगवान राम का विभीषण को शरण में लेना, नीति के अनुकूल है कि प्रीति के ? इसको यदि आप राजनीति की दृष्टि से देखेंगे तो यह भगवान राम की सबसे बड़ी सफलता है, पर प्रेम की दृष्टि से भगवान राम की सबसे बड़ी महानता है ।

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