Sunday, 9 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

रामायण में एक बड़ी मीठी बात यह आती है कि विभीषण जब भगवान की शरण में आये तो बन्दरों ने उन्हें रोक लिया । उनको लगा कि विभीषण निशाचर हैं, और भगवान राम सूर्यवंशी हैं, इसलिए अंधकार और प्रकाश का भला साथ कैसा ? सुग्रीव तक की बात तो उनको ठीक लग रही है, क्योंकि सुग्रीव की भी परम्परा सूर्य से जुड़ी हुई मानी जाती है । पर विभीषण - यह तो अंधकार की परंपरा में हैं । जब विभीषण से परिचय पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मैं रावण का भाई हूँ । बन्दरों ने सुना तो विभीषण जी को रोककर सुग्रीव को सूचना दी कि रावण का भाई प्रभु से मिलने आया हुआ है । प्रभु ने जब देखा कि सुग्रीव के कान में कोई सूचना दी जा रही है, तो भगवान ने पूछा - मित्र ! क्या सूचना है ? सुग्रीव ने कहा - महाराज ! रावण का भाई आपसे मिलने आया हुआ है । आगे सुग्रीव ने इशारों में कहा कि महाराज ! यह प्रेम की भाषा तो हो सकती है कि अगर कोई आया है, तो उसको बुला लो । पर राजनीति की भाषा नहीं है । प्रेम में तो हो सकता है कि सबको अपना लो,  पर नीति तो यही कहती है कि पहले व्यक्ति की परीक्षा लो और पूरी तरह से परख कर तब उसे स्वीकार करो ।
           लेकिन भगवान श्रीराम क्या करने के लिए आये हुए हैं ? इसका स्पष्टीकरण करते हुए रामायण में गुरु वसिष्ठ कहते हैं कि यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति को यही लगता है कि नीति और प्रीति एक दूसरे की विरोधी बातें हैं । क्योंकि जो बहुत प्रेम करेगा वह राजनीति में सफल नहीं होगा । और जो राजनीतिज्ञ होगा वह प्रेम के चक्कर से बचेगा । और इसी प्रकार की मान्यता यह भी है कि जो स्वार्थी होता है, वह परमार्थ तत्व से दूर चला जाता है और जो परमार्थ तत्व की ओर बढ़ता है, वह व्यक्ति स्वार्थ का परित्याग करता है । पर गुरु वसिष्ठ ने कहा - भगवान राम केवल व्यक्तियों को ही एक सूत्र में आबद्ध नहीं कर रहे हैं, अपितु प्रभु तो कहते हैं कि ये जो परस्पर विरोधी दिखायी देने वाली वस्तुएँ हैं, इन्हें भी एक सूत्र में आबद्ध किया जा सकता है ।

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