Friday, 7 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान श्रीराघवेन्द्र के चरित्र में यात्राओं के प्रसंग बहुत से हैं । प्रभु अयोध्या से विश्वामित्र के आश्रम की यात्रा करते हैं । विश्वामित्र के आश्रम से जनकपुर - यात्रा का एक दूसरा रूप है और जनकपुर से वापस लौटकर, भगवान राम की अयोध्या से चित्रकूट तक तीसरी बड़ी लम्बी यात्रा है । चित्रकूट में कुछ समय व्यतीत करने के बाद भगवान राम दण्डकारण्य की ओर प्रस्थान करते हैं, यह भगवान राम की चौथी बड़ी यात्रा है । उसके पश्चात भगवान दण्डकारण्य से किष्किन्धा की ओर यात्रा प्रारंभ करते हैं । इसके पश्चात भगवान लंका की यात्रा करते हैं । तथा सबसे अन्त में पुनः लंका से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं ।
          भगवान राम की इन विविध यात्राओं को आप सामाजिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही सन्दर्भों में देख सकते हैं । अगर इसे सामाजिक संदर्भ में देखें तो इसका तात्पर्य है कि इन यात्राओं के द्वारा भगवान राम सबको एक सूत्र में आबद्ध करते हैं । जैसे मणियों को पिरो देने पर भले ही धागा न दिखायी दे, पर बुध्दिमान व्यक्ति जानता है कि धागे में ही मनके पिरोये हुए हैं, उसी तरह से समस्त ब्रह्मांड के मूल में एकमात्र श्रीराम ही विद्यमान हैं । यह बात स्वयं भगवान कृष्ण ने गीता में कही है । और अपने इस सिद्धांत वाक्य को भगवान श्रीराम ने अपने व्यक्तित्व के द्वारा प्रत्यक्ष करके दिखाया । इसका अभिप्राय है कि अयोध्या से लेकर लंका तक की यात्रा में भगवान श्रीराघवेन्द्र सबको एकता के सूत्र में पिरोकर सबको एकत्र करके मानो सब में अपनी अवस्थिति का परिचय देते हुए दिखायी देते हैं ।

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