भगवान राम ने कर्म-मार्ग में ताड़का का वध किया । ज्ञान-मार्ग में अहिल्या का उद्धार किया । और जब जनकपुर में पहुँच गये तो बड़ी मीठी यात्रा प्रारंभ हुई । गोस्वामीजी कहते हैं भगवान राम बैठे हुए हैं विश्वामित्र जी के पास और लक्ष्मण जी के मन में इच्छा उत्पन्न हुई नगर देखने की । यह नगर है श्रीसीताजी का । और श्रीसीताजी के लिए कहा गया है कि ये माया भी और भक्ति भी हैं । यद्यपि लगता तो यही है कि ये दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं, पर सीता जी के लिए दोनों ही उपाधियाँ दी गयी हैं । और इन सीता जी से भगवान राम का विवाह हुआ जनकपुर में । भगवान राम अखण्ड ज्ञान हैं । मानो अखण्ड ज्ञान का भक्ति से मिलन हुआ । इस प्रकार सीता जी की प्राप्ति - भक्ति की प्राप्ति ही जनकपुर की यात्रा का परम लक्ष्य है ।
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