भगवान राम विभीषण जी के संबंध में सुग्रीव से पूछते हैं - तुम क्या कहते हो ? सुग्रीव ने कहा - महाराज ! यह रावण का भाई है, भेद लेने के लिए आया हुआ है, इसलिए इसको बाँधकर रख लीजिए । भगवान राम मुस्कराकर बोले - अच्छा भाई ! हमारे-तुम्हारे बीच में अगर मतभेद है तो फिर किसी तीसरे से ही पूछ लिया जाय और इसके लिए सबसे उपयुक्त पात्र हनुमान जी ही हो सकते हैं । हनुमान जी ही तो विभीषण को निमंत्रण देकर आये थे । हनुमान जी ने प्रभु का समर्थन कर दिया । यद्यपि सुग्रीव प्रारंभ में थोड़ा सा हताश हुए कि मेरी बात की उपेक्षा करके अपरिचित विभीषण पर इतना विश्वास कर लिया गया । पर जब विभीषण ने प्रणाम किया, तो भगवान राम उठे और कसकर जब उन्होंने विभीषण को ह्रदय लगाया तब, लगा तो विभीषण को ह्रदय से रहे थे पर भगवान श्रीराघवेन्द्र, सुग्रीव की ओर देख रहे थे । सुग्रीव कह सकते हैं कि महाराज ! क्या आप मेरे ऊपर व्यंग्य कर रहे हैं ? भगवान का अभिप्राय था कि मित्र ! मैं व्यंग्य नहीं कर रहा हूँ, वरन तुमसे बताना चाहता हूँ कि मैं तुम्हारी ही आज्ञा का पालन कर रहा हूँ । क्योंकि मैंने जब तुमसे पूछा था कि क्या करना चाहिए, उस समय अगर तुमने कह दिया होता कि इसको मार डालना चाहिए, तब तो मेरे समक्ष बहुत बड़ा संकट आ जाता, पर तुम्हारे मुँह से निकला कि इसे बाँध करके रख लीजिए । और भई ! बाँधने के लिए अब रस्सी आदि मैं कहाँ ढूँढता, इसलिए इसे अपनी भुजा के बन्धन से बाँधकर रख लेता हूँ । यही प्रीति का बन्धन है । और सबसे कठिन (मजबूत) बन्धन भी प्रीति का ही है, नीति का नहीं । क्योंकि नीतिज्ञ तो कैदी को लोहे और रस्सी के बन्धन में बाँधेगा । प्रभु का भाव था कि सुग्रीव देख लो, मैंने विभीषण को अपनी भुजा के बन्धन में इतना कहकर बाँध लिया है कि अब यह जीवन भर कहीं भागकर जाने की चेष्टा नहीं करेगा । इसका अभिप्राय है कि भगवान राम को प्रसन्नता तब होती है जब वे नीति और प्रीति दोनों को मिला देते हैं ।
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