Wednesday, 5 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

विज्ञान के दो भाग होते हैं । विज्ञान का एक भाग वह है जिसमें सिध्दांत की शिक्षा दी जाती है, तथा विज्ञान का दूसरा भाग वह है जिसमें प्रयोग के द्वारा विज्ञान के उन सिध्दांतों की सत्यता की परख की जाती है । यदि सिध्दांत प्रतिपादित न किया जाय तो व्यक्ति किस आधार पर प्रयोग करेगा और प्रयोग के बिना उस सिध्दांत की सत्यता सिध्द नहीं होगी, अतः उसकी वास्तविकता को सिध्द करने के लिए प्रयोग आवश्यक है । इसी प्रकार गीता में सूत्र के रूप में जो सिध्दांत कहे गये हैं रामचरितमानस में उन्हीं का क्रियात्मक रुप है । भगवान राम ने उन सिध्दांतों का अपने चरित्र में पहले पालन और निर्वाह किया । श्रीराम के रूप में भगवान श्रीराम ने उपदेश बहुत कम दिया और श्री कृष्ण के रूप में उपदेश बहुत दिया । यह बड़ी सुनियोजित योजना थी भगवान की । क्योंकि अगर आप अपने जीवन में समझे हुए सत्य को उपदेश के रूप में कहें, जिसका अनुभव आप ने स्वयं किया है, तो सामने वाले को पूरा विश्वास दिला सकते हैं, पर अगर आप केवल सुनी-सुनाई या पढ़ी पढ़ायी बात सुना दें तो सुनने वाले को पूरा विश्वास नहीं होगा । इसीलिए गीता के जितने सिध्दांत हैं, भगवान राम के रूप में स्वयं उन्होंने पहले उन सबको क्रियान्वित किया, और उसकी सत्यता का समग्र अनुभव करने के बाद जब वे कृष्ण के रूप में अवतरित होते हैं तो उन्हीं सिध्दांतों का उपदेश देते हैं ।

No comments:

Post a Comment