रामचरितमानस में भक्ति मार्ग की सुगमता की ओर संकेत किया गया है, पर विनय-पत्रिका में ठीक इससे उल्टी बात आप पायेंगे । वहाँ पर तो गोस्वामीजी कहते हैं - रघुपति भगति करत कठिनाई । - भगवान की भक्ति करना अत्यंत कठिन है । गोस्वामीजी से यह प्रश्न किया गया कि एक ओर तो आप रामचरितमानस में भक्ति मार्ग की सरलता की ओर संकेत करते हैं, और दूसरी ओर विनय पत्रिका में उसे अत्यंत कठिन बताते हैं । तो रामचरितमानस का वाक्य प्रामाणिक है या विनयपत्रिका का ? वस्तुतः भक्ति मार्ग सुगम है या अगम ? उस समय गोस्वामीजी ने इस प्रश्न का उत्तर उस पद में बड़ा सुलझा हुआ दिया है । उन्होंने कहा कि सुगमता और अगमता वस्तुतः व्यक्ति की अपनी-अपनी प्रतीति है । इसका सूत्र देते हुए वे कहते हैं कि जो व्यक्ति जिस कला में निपुण है, उसके लिए वही सुगम है, जो निपुण नहीं है, उसके लिए कठिन है । और बड़ा सुन्दर दृष्टांत देते हुए उन्होंने कहा कि नदी की धारा अगर तीव्र वेग से बह रही है, तो धारा को पार करना सरल है या कठिन ? इस प्रश्न का उत्तर दो पात्रों से पूछ कर देख लीजिए । और वे दोनों पात्र हैं, एक तो छोटी सी मछली तथा दूसरा विशालकाय हाथी । और दोनों से यह प्रश्न जब पूछा जायेगा तब हाथी तो कहेगा कि मेरे लिए कठिन है । परन्तु मछली कहेगी कि यह तो बड़ा सरल कार्य है, क्योंकि जल की उल्टी धारा में मछली तैर कर चली जाती है, और विशाल काय हाथी धारा के तीव्र प्रवाह में बह जाता है । गोस्वामीजी का अभिप्राय है कि हमें सरलता और कठिनता शब्द में उलझने की आवश्यकता नहीं है । बल्कि हमें तो यह निर्णय करने की आवश्यकता है कि हमारे लिए सुगम क्या और अगम क्या है । क्योंकि किसी के लिए कर्म-मार्ग सुगम है, किसी के लिए ज्ञान-मार्ग और किसी के लिए भक्ति-मार्ग सुगम है और जो मार्ग किसी एक के लिए सुगम है, वही दूसरे के लिए अगम बन जाता है ।
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