कर्म के संबंध में भगवान राम ने एक सूत्र देते हुए कहा कि जब आप लोक-कल्याण के लिए कर्म करने चलें तब ताड़का, मारीच और सुबाहु से अवश्य बचें । लेकिन भई ! जिस ताड़का से कर्म-मार्ग के यात्री बच नहीं पाते, सेवा करने वाले भी बच नहीं पाते, उस ताड़का को पहचानिये, कि वह कौन है । इसके आध्यात्मिक स्वरूप का वर्णन करते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि यह ताड़का व्यक्ति के अन्तःकरण में रहने वाली दुराशा है । और यह तो नित्य ही हमें व्यावहारिक जीवन में देखने को मिलता है कि जब हम दूसरों की या समाज की कोई सेवा करते हैं तो बदले में यह आशा जरूर रखते हैं कि हमें भी सम्मान या पद अवश्य मिले । कुछ न कुछ आशा पाल लेते हैं बस यही ताड़का है । भगवान राम ने ताड़का का वध कर दिया, इसका अभिप्राय है कि यदि आपको यज्ञ (कर्म) की रक्षा करनी है, सेवा करनी है तो सेवा कीजिए पर बदले में किसी प्रकार की आशा मत कीजिए ।
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