साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेद सिद्धांत इन चारों का सामंजस्य होना चाहिए । इस सूत्र का तात्पर्य यही है कि इनमें परस्पर टकराहट है । साधुमत और लोकमत में बड़ी भिन्नता दिखायी देती है । साधु अपने विचारों पर दृढ़ रहता है और लोकमत बदलता रहता है । भगवान राम किसके पुजारी हैं - साधु के कि लोक के ? अगर भगवान राम केवल अगस्त्य, बाल्मीकि, भरद्वाज आदि की पूजा करते, उन्हें सम्मान देते, तो यह ठीक ही था, क्योंकि साधु तो पूजा के अधिकारी हैं ही । लेकिन कितना कठिन कार्य भगवान राम ने अपने जीवन में स्वीकार किया । भगवान राम से पूछा गया कि यह तो प्रतिपल बदलने वाला लोकमत है, इसको आप महत्व देते हैं कि नहीं ? तो आप, सब इस बात से भली भाँति भिज्ञ हैं कि साधुमत को सम्मान देने वाले भगवान ने लोकमत को इतना अधिक सम्मान दिया कि एक धोबी के मत को भी, कुछ गिने-चुने व्यक्तियों के मत को भी, भगवान राम मानते हैं । भगवान कहते हैं कि यह कहकर हम छुट्टी पा लें कि संसार वालों का स्वभाव तो बदल जाने का है, यह कदापि ठीक नहीं है । प्रभु का तात्पर्य है कि साधु का सम्मान करना तो ठीक है पर समाज का कल्याण तथा समाज में एकसूत्रता उत्पन्न करना भी हमारा परम कर्तव्य है ।
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