Tuesday, 11 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान श्रीराघवेन्द्र ने शत्रु के भाई विभीषण को अपना मित्र बना लिया, मंत्री बना लिया और उसके द्वारा लंका के रहस्यों को जानकर, लंका के युद्ध को जीत लिया, इससे बढ़कर राजनैतिक सफलता भला क्या होगी ? विभीषण के आने पर, अगर सुग्रीव की बात मानकर भगवान राम विभीषण को लौटा दें, तो भगवान राम की यह जो महानतम नीतिगत सफलता है कि उन्होंने इतना जीत लिया विभीषण का ह्रदय, कि वे पूरी तरह समर्पित हो गये प्रभु के प्रति, वह तो प्रकट होने से रह जाती । इसलिए विभीषण को शरण में लेना नीति के अनुकूल तो है ही, पर साथ-साथ भगवान राम कहते हैं कि नीति और प्रीति परस्पर विरोधी नहीं हैं । भगवान राम का तात्पर्य यह है कि जब नीति होगी ह्रदय में और प्रीति होगी वाणी में, तब वह कल्याणकारी नहीं होगी । पर भगवान राम के चरित्र की विशेषता यह है कि उनके ह्रदय में प्रीति और व्यवहार में नीति विद्यमान है । अपने चरित्र में इन दोनों का सामंजस्य करके भगवान राम दिखाते हैं ।

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