बहिरंग दृष्टि से देखें तो ऐसा लगता है कि विभीषण को शरण में लेने में भगवान राम का स्वार्थ है । इसलिए भगवान राम ने भी लंका के राज्य का प्रलोभन विभीषण को दे दिया । लेकिन गम्भीरता से विचार करने पर हमें इसमें एक भिन्न ही अर्थ का दर्शन होगा । भगवान राम ने जब लंकेश कहा तो विभीषण संकोच में पड़ गये, पर उनका तात्पर्य भिन्न था, जिसका दर्शन आगे चलकर होता है जब भगवान राम ने विभीषण का तिलक किया । तो भई ! राजतिलक करने के बाद अगर भगवान राम विभीषण को लंकेश कहें तब तो बिल्कुल ठीक है, क्योंकि राजतिलक हो जाने के बाद व्यक्ति राजा हो जाता है । पर तिलक करने से पूर्व ही भगवान ने विभीषण को लंकेश कहकर क्यों पुकार दिया । विभीषण जी ने पूछ दिया - प्रभु ! आपने मुझे पहले ही लंका का राजा क्यों कह दिया ? प्रभु ने कहा - विभीषण, अगर लंका का राज्य मैं देता, तो निश्चित रूप से बाद में ही कहता । पर मैं जानता हूँ कि लंका के वास्तविक राजा तो तुम ही हो । विनय-पत्रिका में गोस्वामीजी कहते हैं कि विभीषण जीव है । और रावण का परिचय देते हुए कहा गया कि रावण मूर्तिमान मोह है । इस पर यदि तात्विक दृष्टि से विचार करें तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हमारे जीवन में मोह का शासन है कि जीव का ? भगवान राम कहते हैं कि वस्तुतः राजा तो जीव है, लेकिन मोह नकली राजा बन बैठा है । इसलिए प्रभु ने कहा मित्र ! जब मैं कहता हूँ कि तुम राजा हो तब मैं तो केवल तुम्हारे उस वास्तविक स्वरूप की तुम्हें याद दिला रहा हूँ, जिसको तुम भ्रमवश भूल गये हो ।
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