कर्म, ज्ञान और भक्ति मार्गों में जब भक्ति पथ की प्रशंसा की गयी, तो यही कहकर की गयी कि यह मार्ग अत्यंत सुगम और सरल है -
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा,
योग न जप तप मख उपवासा ।
- इस पंक्ति से ऐसा प्रतीत होता है कि भक्ति मार्ग अत्यंत सरल है । और मानस में ही ऐसी पंक्तियाँ मिलती हैं, जिनको पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे ज्ञान का मार्ग अत्यंत कठिन है । उत्तरकाण्ड में गोस्वामीजी कहते हैं -
ग्यान पंथ कृपान कै धारा ।
परत खगेस होइ नहीं बारा ।।
- इस तरह ज्ञान के मार्ग की कठिनता की ओर संकेत किया गया । लेकिन यह जो ज्ञान मार्ग की कठिनाई है और भक्ति मार्ग की सरलता है, यह तो कहने वाले की अपनी अनुभूति है, इसे सिध्दांत वाक्य मानने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा,
योग न जप तप मख उपवासा ।
- इस पंक्ति से ऐसा प्रतीत होता है कि भक्ति मार्ग अत्यंत सरल है । और मानस में ही ऐसी पंक्तियाँ मिलती हैं, जिनको पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे ज्ञान का मार्ग अत्यंत कठिन है । उत्तरकाण्ड में गोस्वामीजी कहते हैं -
ग्यान पंथ कृपान कै धारा ।
परत खगेस होइ नहीं बारा ।।
- इस तरह ज्ञान के मार्ग की कठिनता की ओर संकेत किया गया । लेकिन यह जो ज्ञान मार्ग की कठिनाई है और भक्ति मार्ग की सरलता है, यह तो कहने वाले की अपनी अनुभूति है, इसे सिध्दांत वाक्य मानने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
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