लक्ष्मण जी के ह्रदय में लालसा है कि जरा जनकपुर देख आवें । पर बोल नहीं पा रहे हैं । और भई ! यह बहुत अच्छी बात है कि जीव के मन में भक्ति के मार्ग पर चलने की इच्छा तो उत्पन्न हुई । और तब भगवान राम ने विश्वामित्र से तुरंत कहा - गुरुदेव ! लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं । गुरु जी ने कहा कि ये क्यों नहीं बोल रहे हैं ! तो प्रभु ने कहा, महाराज ! आपके भय और संकोच से बोल नहीं पा रहे हैं । विश्वामित्र जी ने कहा कि अगर ये नगर देखना चाहते हैं, तो मैं आज्ञा देता हूँ कि ये जाकर नगर देख आयें । भगवान राम ने कहा - महाराज ! आज्ञा मुझे भी चाहिए । विश्वामित्र जी ने हँसकर कहा कि फिर यह क्यों नहीं कहते कि मुझे भी देखना है । प्रभु ने कहा - महाराज ! मुझे बिल्कुल नहीं देखना है । तो फिर तुम कैसी आज्ञा चाहते हो ? भगवान ने स्पष्ट करते हुए कहा - गुरुदेव ये देखना चाहते हैं, लेकिन कोई दिखाने वाला भी तो चाहिए । और भगवान राम का तात्पर्य यह था कि अगर जीव अकेला जायेगा तो मायानगर के चक्कर में फँसे बिना नहीं रहेगा, और मुझे यदि लेकर जायेगा तो भक्ति को प्राप्त करके लौटेगा । इसका अभिप्राय है कि सीताजी को ईश्वर से अलग कर दिया जाय तो वे माया हो जायेंगी पर श्रीराम के साथ मिलकर वे ही भक्ति हो जाती हैं । भगवान का तात्पर्य था कि महाराज ! लक्ष्मण अगर अपनी आँखों से जनकपुर देखेगा तो उलझ जायेगा, भ्रम में पड़ जायेगा । इसलिए मैं स्वयं इसे दिखाऊँगा ।
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