Thursday, 6 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

महर्षि भरद्वाज ने प्रभु की प्रशंसा करते हुए - *सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं* - के रूप में जो वाक्य कहा वह सर्वथा यथार्थ है । क्योंकि भगवान श्रीराम ने अपने चरित्र में कर्म-मार्ग, ज्ञान-मार्ग तथा भक्ति-मार्ग अथवा शास्त्रों में जितने मार्गों का वर्णन किया गया है उन समस्त मार्गों पर चलकर स्वयं उनकी परीक्षा ली । जिस मार्ग पर जिस पध्दति से चलना चाहिए भगवान राम उस मार्ग पर उसी पध्दति से चलते हैं । और सारे मार्गों पर चलने में जो समस्याएँ आती हैं, प्रत्येक मार्ग में चलने का जो कौशल होता है, भगवान राम अपने चरित्र के द्वारा उन सबका दिग्ददर्शन करते हैं । इस प्रकार भगवान राम मार्गों में जितनी भी विधि है, उन सबको स्वीकार करते हैं ।

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