राजनीतिज्ञ की दृष्टि तात्कालिक लाभ की ओर होती है और वेद की दृष्टि पारलौकिक लाभ की ओर । पर प्रश्न यह है कि व्यक्ति को लौकिक लाभ की ओर ध्यान देना चाहिए कि पारलौकिक लाभ की ओर ? और इसका उत्तर तो यही है कि व्यक्ति को जीवन में दोनों की आवश्यकता है । क्योंकि हमारे सिर में अगर पीड़ा होती है, तो हमें दो चेष्टाएँ करनी चाहिए । एक तो यह कि तुरंत ही पीड़ा की तीव्रता मिटे ऐसा कोई उपाय किया जाय तथा दूसरी यह कि रोग के मूल कारण को समझकर उसे भी मिटाने का उपाय करें । क्योंकि जब रोग का मूल कारण ही मिट जायेगा तो फिर दर्द सर्वदा के लिए बन्द हो जायेगा, जिससे बाहरी दवा की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी । इसी प्रकार राजनीति की दृष्टि है - समस्या का तात्कालिक समाधान देना, और समाज में उसकी भी आवश्यकता है । लेकिन वेद का उद्देश्य समस्या का आन्तरिक समाधान देना है, समस्या का जो मूल कारण है उसका समाधान देना है । भगवान श्रीराम साधुमत, लोकमत, राजनीति, वेदनीति, नीति-प्रीति, स्वार्थ तथा परमार्थ इन सब में सामंजस्य की स्थापना करते हैं । और भगवान राम की जो यात्राएँ हैं, यह भी वस्तुतः कर्म, ज्ञान और भक्ति का सामंजस्य ही है ।
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