गोस्वामीजी के लिए राम एक प्रतीक नहीं हैं, 'मिथ' नहीं हैं, माध्यम नहीं हैं । वे तो उनके आराध्य हैं । गोस्वामीजी भगवान राम की विजय गाथा का मानस में वर्णन करते हैं तो संसार के व्यक्तियों या राजाओं की 'जय' से वे इसे भिन्न रूप में देखते हैं । संसार में एक व्यक्ति या एक राजा की विजय का अर्थ होता है दूसरे व्यक्ति या राजा की पराजय । पर भगवान राम की विजय का अर्थ दूसरे की पराजय न होकर सबकी विजय है । श्रीराम की जय में सबकी जय है ।
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