इन्द्र आदि देवता वन्दनीय हैं या निन्दनीय ? इसका उत्तर यह है कि मानस में इन्द्र आदि देवताओं की प्रशंसा भी की गई है और निन्दा भी । देवता वन्दनीय क्यों हैं ? क्योंकि हमारी मान्यता है कि जो पुण्यात्मा होते हैं, वे देवत्व को प्राप्त होते हैं । जो विश्व का श्रेष्ठतम पुण्यात्मा है, वे ही अपने समय में इन्द्र-पद को प्राप्त होते हैं । इसका तात्पर्य है कि देवत्व पुण्य का परिणाम है और इन्द्र-पद पुण्य की पराकाष्ठा का परिणाम है । ऐसी स्थिति में पुण्य के साथ कुछ दोष भी होते हैं या नहीं ? पुण्य में भी कुछ कमियाँ होती हैं या नहीं ? बड़ी सीधी-सी बात है - जब कहा जाता है कि पुण्य से देवत्व प्राप्त होता है और उसके बाद स्वर्ग का जो वर्णन किया गया है, उसमें विस्तार से यही तो बताया है कि स्वर्ग में कितनी प्रचुर मात्रा में भोग सुलभ है, तो यह सब बताने का क्या अभिप्राय है ? पुण्य के द्वारा व्यक्ति देवत्व को पाकर भले ही स्वर्ग के प्रचुर भोग प्राप्त कर ले, पर वस्तुतः देवत्व के द्वारा वह भोग को ही तो जीवन का लक्ष्य बनाए हुए है । मर्त्यलोक में भोग के स्थान पर वह कोई उत्कृष्ट कर्म करके देवलोक में जाकर स्वर्ग के भोगों को भोगना चाहता है । ऐसी स्थिति में पुण्य चाहे जितना ऊँचा हो, उसमें भोग की वृत्ति छिपी हुई है और भोग के साथ जो समस्याएँ जुड़ी हुई हैं, वे स्वर्ग में भी आए बिना नहीं रहेंगी ।
No comments:
Post a Comment