गोस्वामीजी 'विनय पत्रिका' में एक पद में भगवान की उदारता का वर्णन करते हुए कहते हैं - प्रभु राम के सिवाय अन्य किस स्वामी की ऐसी रीती है, जो अपने विरद के लिए पवित्र जीवों को छोड़कर पामरों से प्रेम करता हो ? गोस्वामीजी एक-एक घटना को गिनाते हुए बताते हैं कि कृष्णावतार में राक्षसी पूतना अपने स्तनों में विष लगाकर उन्हें मारने गई थी, पर उन्होंने उसे माता जैसी गति प्रदान की; काम-मोहित गोपियों पर अतुलित कृपा की; जगत के ब्रह्मा ने भी आपकी चरण-धूलि ग्रहण की; जो शिशुपाल प्रतिदिन नियमपूर्वक गिन-गिनकर गालियाँ देता था, आपने उसे राज्यसभा के भीतर ही स्वयं में विलिन कर लिया, मूढ़ व्याध ने मृग समझकर आपके चरणों में तीर मारा, उसे भी आपने अपनी दयालुता की आदत के अनुसार सशरीर अपने लोक में भेज दिया । इस प्रकार पुरातन काल के बड़े पात्रों के नाम गिनाने के बाद अन्त में इस पद की समाप्ति वे अपने नाम से करते हैं - प्रत्यक्ष पापों के पुंज तुलसीदास को भी जिन्होंने अपनी शरण में रख लिया ।इस पद में लम्बे कथानक को सुनकर कोई व्यक्ति पूछ सकता है कि ये पात्र तो बड़े पुराने युग के हैं, हम इनसे परिचित नहीं हैं; तब वे स्वयं को और हम सभी को आश्वासन देते हुए तत्काल याद दिलाते हैं कि अन्य लोगों में तो पाप और पुण्य दोनों रहे होंगे, पर आप लोग मेरी ओर दृष्टि डालिए, वे कहते हैं - मैं तो साक्षात पातक-पुँज ही था, पर मुझ जैसे व्यक्ति ने भी प्रभु की कृपा प्राप्त कर ली, तो किसी व्यक्ति को निराश होने की आवश्यकता नहीं है ।
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