Tuesday, 14 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जनकपुर में परशुरामजी विश्वामित्रजी से मिलते हैं । दोनों में बड़ा स्नेह है । विश्वामित्रजी ने श्रीराम और लक्ष्मण को आगे किया और दोनों भाइयों से परशुरामजी को साष्टांग प्रणाम करवाया । परशुरामजी को दोनों अच्छे लगे । उन्होंने उन्हें आर्शीवाद दिया । पर भगवान राम से वे इतने प्रभावित हुए कि एकटक देखने लगे । जनकजी ने देखा कि आज परशुरामजी शान्त-प्रसन्न दिख रहे हैं । सोचने लगे कि कुछ परिवर्तन दिखाई दे रहा है । पर उसी समय परशुरामजी अचानक सोचने लगे कि मैं किस चक्कर में पड़ गया । क्या मैं रूप-सौंदर्य देखने आया था ? मुझे तो धनुष देखना है । और तब उनकी दृष्टि चली गई खण्डित धनुष पर । और तब उन्हें क्रोध आ गया । गोस्वामीजी ने इन शब्दों से एक बहुत बड़ी बात कह दी । वे कहते हैं कि अखण्ड ज्ञानघन भगवान राम को जब तक परशुरामजी देख रहे थे परम प्रसन्न थे, पर जब उनकी दृष्टि 'अखण्ड' से हटकर खण्डित धनुष पर चली गई तो उन्हें क्रोध आ गया । यही व्यक्ति, समाज और हमारे-आपके जीवन का सत्य है । अखण्ड को देखने से क्रोध शान्त होता है पर खण्ड को - चाहे वह देश, प्रान्त, जाति किसी रूप में क्यों न हो, देखकर क्रोध आना स्वाभाविक ही है । भेद और विभाजन ही क्रोध के मूल में है ।

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