Wednesday, 15 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

परशुरामजी भी अवतार हैं । ब्रह्म को निर्गुण कहा जाता है पर परशुरामजी ने सगुण रूप में अवतार लेकर गुणों को अपने जीवन में सचमुच स्वीकार कर लिया । वे बार-बार स्वयं कहते हैं कि मैं ब्राह्मण हूँ, ब्रह्मचारी हूँ, मैंने बड़े-बड़े राजाओं से युद्ध कर उन्हें हराया है । मैंने कई बार पृथ्वी को क्षत्रियों से खाली करके उसे ब्राह्मणों को दान कर दिया है । इतना ही नहीं वे विश्वामित्रजी से भी यही कहते हैं कि इन राजकुमारों को मेरे शौर्य और विजय का इतिहास सुनाओ । पर भगवान राम ऐसा कुछ नहीं कहते । भगवान राम ने कहा - महाराज ! मैं तो अपने आपको आपसे तुलना के योग्य नहीं मानता । आप महान हैं, प्रणम्य हैं और मैं तो बस आपके चरणों में ही प्रणाम कर सकता हूँ । परशुरामजी ने कहा - इन बातों से काम नहीं चलेगा, तुम्हें लड़ना ही पड़ेगा । भगवान राम बोले - महाराज ! लड़ने से क्या होगा ? - एक जीतेगा, दूसरा हारेगा, परशुरामजी बोले । भगवान राम बोले - हार-जीत की ही बात है तब तो मैं पहले ही स्वीकार करता हूँ कि मैं सभी प्रकार से आपसे हारा हुआ हूँ । भगवान राम दूसरों को हराने में विश्वास नहीं करते । इस प्रकार वे हार स्वीकार करके भी जीत जाते हैं ।

No comments:

Post a Comment