मानस में दो प्रकार के पात्र हैं - बड़े उच्च चरित्र वाले सिद्ध पात्र और अंगद के समान ऐसे पात्र, जो विषय-पारायण हैं । उनके जीवन में साधना और उसके बाद सिद्धि आती है । अंगद का चरित्र सर्वप्रथम किष्किन्धाकाण्ड में उस समय समाने आता है, जब भगवान श्रीराघवेन्द्र बालि के ऊपर बाण चलाते हैं । और बालि गिर जाता है, प्रभु आकर बालि के सामने खड़े हो जाते हैं । बालि भगवान को कुछ उलाहने देता है और कुछ प्रश्न करता है । भगवान बड़े कठोर शब्दों में बालि की भर्त्सना करते हैं और इसकी अन्तिम परिणति यह होती है कि बालि में सहसा एक परिवर्तन आता है तथा अपनी धृष्टता के लिए उनसे क्षमा माँगता है, भगवान की दया एवं करुणा की दुहाई देता है और तब भगवान की करुणा का रुप सामने आता है । भगवान बालि के मस्तक पर हाथ रख प्रस्ताव करते हैं कि वह जीवित रहे । परन्तु बालि बड़ी विनम्रतापूर्वक इस पुरस्कार को अस्वीकार कर देता है । बालि ने सोचा कि इस समय तो शरीर को त्यागने में ही धन्यता है । लेकिन इसके साथ-साथ बालि ने भगवान से कहा - प्रभो, एक रूप में तो मैं आपके धाम में जाकर मुक्ति के आनंद का अनुभव करुँगा, परन्तु दूसरे रूप में सेवा का सुख भी पाना चाहता हूँ । इस तरह बालि ने अन्तिम क्षणों में ज्ञान और भक्ति - दोनों का सुख पा लिया । ज्ञान की चरम परिणति है मुक्ति और भक्ति का चरम लक्ष्य है - भगवान की सेवा ।बालि जीवन के अन्तिम क्षण में अपने पुत्र अंगद को बुलाकर उसे भगवान राम के हाथ में सौंप देता है और भगवान राम अंगद को स्वीकार करते हैं । यह मानस में आने वाला अंगद का पहला चित्र है ।
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