भगवान राम के चरित्र की विशिष्टता के सन्दर्भ में महाराज दशरथ गुरु वसिष्ठ से जो वाक्य कहते हैं वह बड़े महत्व का है । महाराज दशरथ के मन में जब यह बात आई कि श्रीराम को युवराज पद पर अभिषिक्त करें, तो वे गुरु वसिष्ठ के पास गए और कहा कि मैं यह दावा नहीं करता कि मेरे विरोधी नहीं हैं, शत्रुता का भाव रखनेवाले नहीं हैं । वे कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति हैं जो मुझसे प्रेम करते हैं, मित्रता रखते हैं । कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं जो वैर-विरोध रखते हैं और कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं जो न तो मित्रता ही रखते हैं और न ही विरोध करते हैं । पर मैंने एक बात अनुभव किया है कि जहाँ तक राम का संबंध है वे सभी राम से उतना ही प्रेम करते हैं जितना प्रेम मैं करता हूँ । यह गुण मुझमें नहीं है, जो राम में है । मानस में यह भी कहा गया कि 'बैरिहु राम बड़ाई करिही' भगवान राम की प्रशंसा शत्रु भी करते हैं ।
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