Saturday, 18 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मानस में कुछ चरित्र ऐसे हैं, जो साधना की दृष्टि से बड़े उपयोगी हैं और उनमें से एक है अंगद का चरित्र । अंगद के चरित्र में कुछ उत्कृष्ट गुण हैं, तो उनके साथ कुछ कमियाँ भी हैं । परन्तु उनके चरित्र की यह विशेषता है कि उसमें निरन्तर विकास होता हुआ दिखाई देता है और वे क्रमशः अपनी कमियों से ऊपर उठते हुए भक्ति की चरम स्थिति तक पहुँचने में समर्थ होते हैं । दूसरी ओर मानस में कुछ चरित्रों में उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट गुण विद्यमान हैं । वे सिद्धावस्था तथा परिपूर्णता के चरित्र होते हुए भी हमारे लिए वन्दनीय और आदर्श तो हैं, परन्तु साधना की उन्नति के लिए जिस क्रम की आवश्यकता है, उन चरित्रों में उनका दर्शन नहीं होता है । पर कुछ पात्र ऐसे भी हैं, जिनके चरित्र में गुण और दोष दोनों ही पक्ष विद्यमान हैं । काकभुशुण्डिजी का चरित्र भी उनमें से एक है, जिसमें साधना की दृष्टि से क्रमिक विकास दिख पड़ता है ।

No comments:

Post a Comment