परशुरामजी भगवान राम को एक आखिरी कसौटी पर कसना चाहते हैं । वे समझ गए थे कि नवीन अवतार मेरे सामने खड़े हैं । पर वे अपने सन्देह को मिटाने के लिए एक परीक्षा लेना चाहते हैं । उनके पास एक विष्णुजी का धनुष था जिसे वे इतने दिनों तक धारण किए हुए थे । उन्होंने उस धनुष को आगे बढ़ाते हुए भगवान राम से कहा - तुम इस धनुष को लो और इसे चढ़ा दो तो मैं समझ लूँगा कि विष्णु का अवतार हो गया है और फिर मैं अपनी भूमिका समाप्त कर दूँगा । पर आश्चर्य ! भगवान राम ने उस धनुष को लेने के लिए अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया ! क्यों नहीं बढ़ाया ! अगले ही क्षण इसका उत्तर भी मिल गया । धनुष स्वयं ही परशुरामजी के हाथ से निकलकर भगवान राम के पास चला गया । बड़ी सांकेतिक भाषा है । नेता का अर्थ है - नेय मान - जो अपनी ओर खींच ले, अपनी विशेषताओं के कारण । परशुरामजी का तात्पर्य था कि नये अवतार, नये नेतृत्वदाता नेता का यदि आगमन हो गया है तो वह गुण को अपनी ओर खींच ले । पर भगवान राम के द्वारा हाथ आगे नहीं बढ़ाए जाने के पीछे यही तात्पर्य है कि प्रयासपूर्वक, श्रमपूर्वक अपनी ओर खींचने की चेष्टा में तो श्रम करना पड़ेगा, थकान होगी, पकड़ ढीली होते ही प्रत्यंचा फिर अपने स्थान पर वापस आ जाएगी । अतः प्रयासपूर्वक खींचने की नहीं, स्वयं गुण ही जिसके पास खिंचे चले आएँ, ऐसे नेता की आवश्यकता है ।
No comments:
Post a Comment