Monday, 27 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

देवत्व में अपनी असमर्थता का भान होने पर वे तत्काल ब्रह्मा के साथ मिलकर भगवान से प्रार्थना करते हैं और तब आकाशवाणी होती है । इससे बढ़कर साधना का उत्कृष्ट फल और क्या हो सकता है कि किसी की साधना से, प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान अवतार लेने की घोषणा करें । यह देवत्व का बड़ा उज्ज्वल पक्ष है, देवत्व का जो दुर्बल पक्ष है, वह भी समझ लेने योग्य है । उसके लिए गोस्वामीजी ने एक बड़ी सांकेतिक बात कही -
    गगन ब्रह्मबानी सुनि काना ।
     तुरत फिरे सुर ह्रदय जुड़ाना ।।
यहाँ तुरत शब्द का अभिप्राय यह है कि वे इतने उतावलेपन से स्वर्ग की ओर जाने लगे मानो कैसे जल्दी-से-जल्दी स्वर्ग पहुँचें । इस तुरत शब्द के द्वारा गोस्वामीजी ने देवताओं की मनःस्थिति को प्रगट कर दिया कि मानो वे हड़बड़ी में हों । यही देवताओं का दुर्बल पक्ष है । इसका रहस्य क्या था ? यह कि प्रार्थना से भगवान प्रसन्न हो गए और रावण के वध करने का आश्वासन दिया । देवताओं को लगा कि भगवान ने तो कह दिया है कि वे रावण का वध करेंगे, अब हम लोग शीघ्र चलकर अप्सराओं का नृत्य देखें, विहार करें, अब हमें तो कुछ करना धरना नहीं है । इसका अर्थ है कि भगवान की पूजा के बाद भी मन भोग की ओर ही लगा हुआ है । यह जो भोग की वृत्ति है, वह इस तुरत शब्द के द्वारा व्यक्त की गयी है ।

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