गोस्वामीजी धनुष-भंग प्रसंग में उस समय के राजाओं की मनःस्थिति का एक व्यंग्यात्मक चित्र प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि जिस समय परशुरामजी आए तो उपस्थित सब राजा, जो भगवान राम से युद्ध करना चाहते थे, आतंकित हो गए । पर जब परशुरामजी ने यह पूछा कि धनुष किसने तोड़ा है ? तो यह सुनकर उन्होंने चैन की साँस ली । बात यह थी कि जब ये राजा धनुष तोड़ने के लिए चलते थे तो इष्टदेव से प्रार्थना करते थे कि धनुष हमसे तुड़वा दीजिए । पर जब उनसे धनुष नहीं टूट पाता तो वे लौटकर अपने-अपने इष्टदेवों को उलाहना देते थे कि मैंने आपकी पूजा-प्रार्थना की और आपने यह फल दिया । उन्हें बड़ा दुख होता था । और जब धनुष भगवान राम के हाथों टूट गया तो वे राजा अत्यधिक दुखी हो गए कि हमसे धनुष टूटा नहीं और एक छोटी अवस्था के राजकुमार ने तोड़ दिया । इस प्रकार वे सब राजा अपने-अपने इष्ट देवताओं से बहुत नाराज थे । पर जब परशुरामजी ने पूछा तो सभी राजा बड़े प्रसन्न हुए और अपने-अपने इष्ट देवों को धन्यवाद देने लगे कि आपने अच्छा किया जो हमसे धनुष नहीं तुड़वाया ! यदि तुड़वा दिया होता तो आज हमारा सिर अवश्य ही कट गया होता ! यही मनुष्य का स्वभाव है । अच्छे-बुरे की परिभाषा उसके स्वार्थ के अनुसार बदलती रहती है ।
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