जब भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा कि मैंने निर्णय किया है कि जिस बाण से मैंने बालि का वध किया था, मूर्ख सुग्रीव का भी वध उसी बाण से कर दूँगा । सुनकर लक्ष्मणजी ने प्रभु से कहा - महाराज ! यह कार्य आप मुझे करने दीजिए । जब बड़े भाई ने अपराध किया तो आपने दण्ड दिया, अब छोटे भाई के अपराध का दण्ड छोटा भाई दे, यही उचित होगा । लक्ष्मणजी धनुष-बाण चढ़ाकर चलने लगे । तब भगवान राम ने उनका हाथ पकड़ लिया और समझाने लगे - लक्ष्मण ! ऐसा न हो कि कहीं जाकर उसे मार ही डालो ! - प्रभु आप ही ऐसा कह रहे थे ! प्रभु बोले - मेरा उद्देश्य उसे मारना नहीं था, बस उसे डराना था । वह भय के मारे मेरा भक्त बना था । बालि के मरने से उसका भय जाता रहा, इसलिए वह मुझे भूल गया । अतः उसे मारना नहीं है । तुम जाकर उसे थोड़ा-सा भय दिखा दो, वह पुनः मेरा भक्त बन जायेगा । लक्ष्मणजी ने कहा - मैं आपकी बात ठीक से समझ नहीं पा रहा हूँ पर आपका आदेश है तो जाकर उसे डराता हूँ । लक्ष्मणजी चलने लगे तो प्रभु ने फिर कहा - लक्ष्मण ! एक बात और याद रखना । वह जितना बड़ा डरपोक है उतना ही बड़ा 'भगोड़ा' भी है । अतः तुम उसे इस ढंग से डराना कि वह भागकर कहीं दूर न चला जाय, इधर ही आए । गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान राम के भय के पीछे भी उनकी कृपा दिखाई देती है ।
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