मानस में कहा गया है कि भगवान राम की प्रशंसा शत्रु भी करते हैं । इसका संक्षेप में सूत्र यही है कि हमारी सफलता का अर्थ है, दूसरे की असफलता और हमारी विजय का अर्थ है दूसरी की पराजय । सृष्टि में यह द्वन्द समाज में दिखाई देता है । इसीलिए समाज में अधिकांशतः जो दुख दिखाई देता है वह अभावजन्य न होकर ईर्ष्याजन्य है कि हमसे अधिक हमारे पड़ोसी के पास क्यों है । हमारे चिन्तन की दिशा ठीक नहीं है । हम यह मानकर चलते हैं कि दूसरों का दुख, दूसरों का अभाव ही हमारा सुख है, हमारी सम्पन्नता है । इस चिन्तन में परिवर्तन की आवश्यकता है । भगवान राम बन पाना यद्यपि हमारे लिए सम्भव नहीं है पर उस चिन्तन का एक बिन्दु भी हमारे जीवन में आ सके तो जीवन धन्य हो सकता है ।
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