Thursday, 23 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गुण-दोष का वर्णन केवल अपने गुण और दूसरों के दोष देखने के लिए नहीं किया गया है, वह तो अपने ही जीवन में दोषों का त्याग और गुणों का संग्रह करने के लिए है । हमारे जीवन में तो उल्टा ही हो जाता है । दूसरों के दोष देखकर हम उनसे घृणा करने लग जाते हैं, उनकी निन्दा करने लग जाते हैं । इसका अर्थ यह है कि इस विषय में हमारी दृष्टि भ्रान्त है, हम दूसरों का दोष देखते हैं, व्यक्ति को दोषी देखते हैं, पर यह नहीं देखते कि दूसरों का दोष-दर्शन करते हुए, निन्दा करते हुए हम स्वयं भी दोषों में लिपटे हुए हैं । वैसे ही हम गुणों की प्रशंसा तो बहुत करते हैं, पर गुणों को जीवन में लाने की चेष्टा नहीं करते । मानस का तात्पर्य है कि जब हम किसी का गुण देखते हैं, तो उद्देश्य केवल उन गुणों की प्रशंसा करना नहीं है, उद्देश्य तो उन गुणों को जीवन में लाना है । इसी प्रकार जब किसी पात्र के दोषों का वर्णन किया जाता है, तब उसका उद्देश्य भी यही रहता है कि यदि हमारे जीवन में दोष हों तो उसका परित्याग कर देना चाहिए ।

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