Tuesday, 28 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान के रावण वध की घोषणा सुनकर देवता जब शीघ्रता से स्वर्ग की चलने लगे तब ब्रह्माजी ने देवताओं को वापस बुलाया । ब्रह्मा विवेक के देवता हैं । वे देवताओं से बोले कि आप लोग इतने उतावले होकर कहाँ भाग रहे हो ? देवता बोले कि महाराज, अब तो हम लोग निश्चिंत हो गए, क्योंकि भगवान ने तो कह ही दिया है कि हम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे । ब्रह्मा ने कहा - तुम लोगों ने ध्यान से नहीं सुना । क्या ? भगवान केवल इतना भी तो कह सकते थे कि हम रावण को मार देंगे, मिटा देंगे, परन्तु उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा । रावण को मिटा देना भगवान के लिए कोई प्रयत्नजन्य कार्य थोड़े ही है । वे तो केवल संकल्प मात्र से ही रावण तथा समस्त राक्षसों को मिटा सकते हैं, परन्तु उन्होंने यह जो कहा कि हम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे । तुमने उनकी इस बात पर ध्यान नहीं दिया । भगवान ने यह अवश्य कहा कि हम तुम्हारी समस्या का समाधान करेंगे, पर उसमें उन्होंने एक वाक्य और जोड़ दिया है, तुम्हारे लिए हम नर का वेश धारण करेंगे । इसका अर्थ यह है कि उन्होंने रावण का विनाश ईश्वरीय पद्धति से न करके मानवीय पद्धति से करने का निर्णय किया है । इसका अभिप्राय क्या है ? जो सिद्ध सत्य था, उसको साधन का सत्य बनाने के लिए ही भगवान नर रूप लेने वाले थे ।

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