प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान के रावण वध की घोषणा सुनकर देवता जब शीघ्रता से स्वर्ग की चलने लगे तब ब्रह्माजी ने देवताओं को वापस बुलाया । ब्रह्मा विवेक के देवता हैं । वे देवताओं से बोले कि आप लोग इतने उतावले होकर कहाँ भाग रहे हो ? देवता बोले कि महाराज, अब तो हम लोग निश्चिंत हो गए, क्योंकि भगवान ने तो कह ही दिया है कि हम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे । ब्रह्मा ने कहा - तुम लोगों ने ध्यान से नहीं सुना । क्या ? भगवान केवल इतना भी तो कह सकते थे कि हम रावण को मार देंगे, मिटा देंगे, परन्तु उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा । रावण को मिटा देना भगवान के लिए कोई प्रयत्नजन्य कार्य थोड़े ही है । वे तो केवल संकल्प मात्र से ही रावण तथा समस्त राक्षसों को मिटा सकते हैं, परन्तु उन्होंने यह जो कहा कि हम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे । तुमने उनकी इस बात पर ध्यान नहीं दिया । भगवान ने यह अवश्य कहा कि हम तुम्हारी समस्या का समाधान करेंगे, पर उसमें उन्होंने एक वाक्य और जोड़ दिया है, तुम्हारे लिए हम नर का वेश धारण करेंगे । इसका अर्थ यह है कि उन्होंने रावण का विनाश ईश्वरीय पद्धति से न करके मानवीय पद्धति से करने का निर्णय किया है । इसका अभिप्राय क्या है ? जो सिद्ध सत्य था, उसको साधन का सत्य बनाने के लिए ही भगवान नर रूप लेने वाले थे ।
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