Thursday, 2 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

'अनादित्व' ही रामायण का मूल दर्शन है । भगवान शंकर रचियता होने का कोई दावा नहीं करते । हम सब गोस्वामीजी को 'मानस' का रचियता भले ही मानते हों पर वे कहते हैं कि जो कथा मैंने अपने गुरुजी के द्वारा सुनी उसे ही भाषाबद्ध कर रहा हूँ । वे भी अपने आपको रचियता नहीं मानते । बड़ी अद्भुत-सी बात है । भगवान शंकर से लेकर गोस्वामीजी तक अपने आपको निर्माता न मानकर बस एक माध्यम ही मानते हैं । पर हमारी बिडम्बना यह है कि हम इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमने सृजन किया है । वस्तुतः कोई व्यक्ति एक माध्यम ही होता है जिसके द्वारा कोई कृति संसार के सामने आती है ।

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