Thursday, 30 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

रावण मारा गया । देवता फूल बरसाते हुए भगवान श्रीराम को बधाई देने के लिए आए, पर वहाँ तो बड़ा विचित्र दृश्य था । भगवान बन्दरों से घिरे हुए बैठे उनसे विनोद कर रहे हैं । जब देवता आए, तो बन्दरों ने उन्हें भगवान के निकट पहुँचने के लिए मार्ग ही नहीं दिया । उन्हें दूर से ही खड़े होकर स्तुति करनी पड़ी । अद्भुत दृश्य है ! देवता तो भगवान से दूर हैं और बन्दर बिल्कुल पास में बैठे हुए हैं । उस समय देवता जो स्तुति करते हैं, उसमें एक वाक्य आता है, देवता भगवान से कहते हैं - प्रभो ! हमारे देव-शरीर को धिक्कार है । भगवान बोले कि क्यों ? देवता बोले कि महाराज ! आपकी भक्ति के बिना अभी भी हम लोग भोग में डूबे हुए हैं, इसलिए हमें धिक्कार है । पर इसके साथ अगले वाक्य में उन्होंने अपने ही दूसरे रूप की प्रशंसा करते हुए यह भी कहा कि महाराज ! धन्य तो ये वानर हैं, जो आपके समीप बैठे हुए प्रेमपूर्वक आपके मुख को निरख रहे हैं और हम दूर खड़े हुए हैं । मानो अपने ही एक रूप की स्तुति कर रहे हैं और दूसरे रूप की निन्दा । वानर के रूप में देवता ही हैं । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि भोगी भगवान तक पहुँचकर भी उनसे दूर है और जो भगवान की सेवा में संलग्न हैं, वे उनके अत्यंत निकट हैं ।

No comments:

Post a Comment