Sunday, 12 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

जनकपुर की सभा में गोस्वामीजी भगवान राम और परशुरामजी महाराज दोनों की उपस्थिति का जो वर्णन करते हैं उसमें एक विलक्षणता दिखाई देती है । दोनों ही अवतार हैं । दोनों ही प्रकाशमय हैं । परशुरामजी जब आते हैं तो गोस्वामीजी लिखते हैं कि भृगुकुल के सूर्य आए । और भगवान राम जब धनुष तोड़ने के लिए खड़े हुए तो गोस्वामीजी उनको भी सूर्य बताते हैं । परशुरामजी सूर्य हैं और भगवान राम भी सूर्य हैं, पर दोनों सूर्यों में एक भिन्नता है । सूर्य में प्रकाश है और ताप भी है । शीतकाल में हम बड़ी आतुरता से सूर्य की प्रतीक्षा करते हैं कि कब सूर्य निकले जिससे हमारी शीत की पीड़ा का निवारण हो । पर जेठ की दुपहरी में जब सूर्य का प्रकाश और ताप सबसे अधिक होता है, तब हम उसका स्वागत करने के स्थान पर उससे भयभीत हो जाते हैं और प्रयास करते हैं कि इस सूर्य से दूर किसी अँधेरे स्थान पर छिपकर अपने आपको बचावें ! इसका अभिप्राय है कि सूर्य जब प्रकाश देता है, शीत का निवारण करता है, तब वह हमारे लिए प्रिय हो जाता है पर जब वह हमें तप्त करने लगता है तो हमारे लिए भय का कारण बन जाता है । इसी प्रकार भगवान राम और परशुरामजी, दोनों ही सूर्य हैं पर अन्तर यही है कि परशुरामजी जेठ की दुपहरी वाले सूर्य हैं और भगवान राम शरद्कालीन प्रातःकाल के सूर्य हैं ।

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