Sunday, 26 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

देवता पूज्य हैं, पर पूज्यता के साथ यदि उनमें कोई कमी है, तो उसे भी बताना गीता, रामायण और भागवत का उद्देश्य है । देवता दोनों पक्षों को प्रगट करते हैं । देवत्व का वन्दनीय पक्ष तो सुन्दर है ही । जब देवताओं पर अत्याचार हुआ और व्याकुल होकर उन्होंने भगवान से प्रार्थना की, तो उन्होंने प्रसन्न होकर घोषणा की कि वे अवतार लेंगे । यह देवताओं का बड़ा उत्कृष्ट और प्रशंसनीय पक्ष है । इसका अभिप्राय यह है कि देवता जब यह अनुभव करता है कि हम बुराई को मिटाने में समर्थ नहीं हैं, तो अन्त में उनकी दृष्टि भगवान की ओर जाती है और यही देवता का वन्दनीय पक्ष है । देवता और दैत्य में सबसे बड़ा अन्तर यही है कि दैत्य न तो अपने आप में असमर्थता का अनुभव करता है और न ईश्वर की ओर दृष्टि डालता है, पर देवत्व में जहाँ पर अपनी असमर्थता का भान है, अपनी कमी का ज्ञान है, वहीं पर दृष्टि भगवान की ओर चली जाती है ।

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