Friday, 10 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

मानस में वर्णन आता है कि सुग्रीव राज्य प्राप्त करने के बाद आमोद-प्रमोद में इतना डूब गए कि 'श्रीसीताजी का पता लगाना है' इस बात का उन्हें स्मरण ही नहीं रहा । प्रभु ने उस समय क्रोध का बहुत बढ़िया अभिनय किया । प्रभु बोले - लक्ष्मण ! देख रहे हो न ! सुग्रीव राजपाट पाकर मुझे भुल गया । अतः मैंने निर्णय किया है कि जिस बाण से मैंने बालि का वध किया था, मूर्ख सुग्रीव का भी वध उसी बाण से कल कर दूँगा । सुनकर लक्ष्मणजी को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरी भाषा बोलने का अभ्यास प्रभु को है नहीं ! फिर प्रसन्नता हुई कि बहुत अच्छा है कि प्रभु को क्रोध तो आया ! पर एक बात उन्हें अच्छी नहीं लगी कि 'प्रभु कल मारुँगा' क्यों कह रहे हैं ? क्या हमें सुग्रीव को मारने के लिए कोई सेना इकठ्ठी करनी है ? पर इस कल शब्द से ही भगवान राम के चरित्र की विशेषता प्रगट होती है । मानो वे बताना चाहते हैं कि यदि क्रोध आ जाय तो उसकी प्रतिक्रिया के रूप में जो कार्य करना चाहते हैं उसे तुरन्त ही क्रियान्वित न करके 'कल' पर टाल दीजिए ।

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