Saturday, 4 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी ने मानस के प्रारंभ में सरस्वतीजी का स्मरण किया । सरस्वतीजी को हम विद्या और काव्य की देवी मानते हैं । और जब कोई उनकी वन्दना करता है, स्मरण करता है तो वे ब्रह्मा के लोक को छोड़कर, उतावली हो दौड़ी चली आती हैं । गोस्वामीजी बड़ी मीठी बात कहते हैं कि जब सरस्वती इतनी दूर से दौड़कर आती हैं तो स्वाभाविक रूप से उनमें थकान आ जाएगी । और ऐसी स्थिति में यदि उनसे सीधे कह दिया जाय कि आप कविता बनाने के काम में लग जाइए तो यह तो बड़ी अभद्रता होगी । क्योंकि हमारे निमन्त्रण पर आने वाले सामान्य अतिथि से भी हम ऐसा व्यवहार नहीं करते । हम पहले उसकी थकान मिटाने तथा भोजन आदि की व्यवस्था करते हैं और तब उससे काम की बात करते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि सरस्वतीजी को भी पहले विश्राम तो दीजिए और इसके लिए उन्हें स्नान कराइए - रामचरित्र के सरोवर में स्नान कराने से उनकी थकान मिट जाएगी । सरस्वतीजी भी मानो ईश्वर के गुणानुवाद से, ईश्वर की वंदना से काव्य का प्रणयन प्रारंभ करती हैं । पर कुछ लोग ऐसा नहीं करते । वे भगवान राम का स्मरण नहीं करते और सीधे ही कविता बनाने का कार्य सरस्वतीजी को सौंप देते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि मैं उस रचना को कविता नहीं मानता ।

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