Friday, 3 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

प्राचीनकाल में यह परंपरा थी कि काव्य या किसी ग्रन्थ के निर्माण से पूर्व मंगलाचरण के रूप में देवताओं की स्तुति की जाती थी । कई लोगों को लगता है कि यह तो व्यर्थ की बात है । देवताओं की वन्दना नहीं करेंगे तो क्या ग्रन्थ पूरा नहीं होगा ? क्या इसके बिना अच्छे ग्रन्थ की रचना नहीं होगी ? तो इसका उत्तर तो यही है कि हाँ ! हो सकती है ! पर वन्दना की आवश्यकता के पीछे जो भाव है वह दूसरा है । जब हम किसी देवता की वन्दना करते हैं, स्तुति करते हैं तो हम उससे शक्ति चाहते हैं कि जिससे हम उस ग्रन्थ का निर्माण कर सकें ! और इस प्रकार उस रचना के पीछे हम अपनी शक्ति न देखकर देवता की शक्ति को देखते हैं । और तब हमारे मन में रचनाकार के अहं के स्थान पर देवता के प्रति कृतज्ञता का भाव जागृत होता है । हम अहंकार से बच जाते हैं ।

No comments:

Post a Comment