भगवान राम व्यक्ति को न तो हराना चाहते हैं और न स्वयं विजयी होना चाहते हैं । उनका संघर्ष, उनका युद्ध एक वैद्य या डाॅक्टर की तरह रोग रूपी दुर्गुणों से है, विकारों से है । रोग के विरुद्ध लड़ने वाले डॉक्टर के प्रति रोगी का कृतज्ञ होना तो स्वाभाविक ही है । इसलिए भगवान राम की जो विजय है वह सबकी विजय है । यही रामराज्य का दर्शन है । हम जीवन में बाहरी समस्याओं का समाधान तो खोजते ही हैं पर उनका स्थायी निदान खोजने के लिए हमें अपने अन्तःकरण में, अपने मानस में प्रवेश करने की आवश्यकता है । अन्तःकरण के 'पंच विकार' अनेक साधनाओं के होते हुए भी बिना भगवत्कृपा के पूरी तरह नहीं मिट पाते । गोस्वामीजी यह कहकर व्यक्ति को सचेत करते हैं कि हमारे अन्तःकरण में ये जो पाँच विकार भरे हुए हैं उन्हें पलटकर उन पात्रों में हम प्रभु के गुणों को भरकर रखें ।
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