Saturday, 25 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

हमारे शास्त्र बिना किसी संकोच के यह बात कह देते हैं कि पुण्य से देवत्व प्राप्त होता है, पर इसके साथ एक अन्य वाक्य भी जुड़ा हुआ है - *क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति* । आपने पुण्य के द्वारा भोग पाया, पुण्य की पूँजी समाप्त हुई और आप पुनः स्वर्ग से नोचे ओर ढकेल दिए जाएँगे । इसका अभिप्राय यह है कि यह देवत्व भी उत्थान और पतन के क्रम से मुक्त नहीं है । देवत्व वन्दनीय है, परन्तु इस अर्थ में नहीं कि उसमें कोई कमी नहीं है । देवता निन्दनीय भी हैं और प्रशंसनीय भी । हमें बस इतना ही सावधान रहना है कि जहाँ तक वे वन्दनीय हैं, हम उनकी वन्दना करें, यह नहीं कि कहीं पर देवता की निन्दा कर दी गई, तो हम उनकी पूजा करना ही बन्द कर दें ।

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