Sunday, 5 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

किसी ने गोस्वामीजी से पूछा कि आपने भी जब सरस्वतीजी को बुलाया तो उनके आने पर उन्हें स्नान कराया या नहीं ? उनकी थकान मिटाई या नहीं ? गोस्वामीजी ने कहा कि मैंने ब्रह्मलोक की सरस्वती को बुलाने का साहस ही नहीं किया । गोस्वामीजी ने एक और सरस्वती का परिचय देते हुए कहा कि मैंने एक दूसरी सरस्वती को बुलाया जो 'काठ की पुतली' हैं और जिनका निवास भगवान राम के पास है । वे कहते हैं कि यह सरस्वती चेतन न होकर एक कठपुतली है, जिसके सूत्रधार प्रभु ही हैं । वे ही इसे नचाते हैं । प्रभु जिस पर कृपा कर देते हैं उसके ह्रदय में प्रभु इस सरस्वती को नचाते हैं । और वह कवि बन जाता है । वस्तुतः कवि की वाणी पर यह जो काव्य होता है, वह सरस्वती का नृत्य ही तो है । गोस्वामीजी से पूछा गया कि आपने भगवान राम के द्वारा संचालित-नियंत्रित 'कठपुतली' सरस्वती को ही क्यों बुलाया ? ब्रह्मलोक की सरस्वती को बुलाते ! गोस्वामीजी ने कहा कि संसार में जितने नाचनेवाले हैं, या ब्रह्मलोक की सरस्वती है, वे सब नाचते हैं तो नाचते-नाचते थक जाते हैं । पर एकमात्र 'कठपुतली' का नृत्य ही ऐसा होता है जिसमें नाचनेवाली कठपुतली नहीं थकती, अपितु उसे नचानेवाला थकता है । मानो वे इसके द्वारा संकेत देते हैं कि कवि के रूप में दिखाई देने पर भी असली कवि तो प्रभु ही हैं ।

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