Wednesday, 22 November 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

निन्दा और प्रशंसा दो प्रकार से की जाती है । एक तरह की निन्दा- प्रशंसा तो की जाती है - द्वेष-राग या आसक्तिवश । जिसके प्रति आपका राग है, उसकी आप प्रशंसा करते हैं और वैसे ही जिसके प्रति हमारे मन में द्वेष या विरोध की भावना है, उसकी हम निन्दा करते हैं, परन्तु हमारी परम्परा के जो महान ग्रन्थ हैं, इनमें जो निन्दा और प्रशंसा है, वह वस्तुतः व्यक्तिपरक नहीं है । मानस में गोस्वामीजी ने कई प्रसंगों में लिखा है कि गुण-दोष मिथ्या है, पर जब उन्होंने सन्त के गुण और असन्तों के दोषों का वर्णन किया, तो किसी ने कहा, महाराज, यह तो आपकी बात स्वयं अपने आप कट गई; एक ओर तो आप गुण-दोष का भेद ही मिथ्या बताते हैं और दूसरी ओर आप इतने विस्तारपूर्वक गुणों और दोषों का वर्णन करते हैं । ऐसा क्यों ? गोस्वामीजी कहते हैं - वस्तुतः ये जो गुण-दोष बताए गए हैं, उसका उद्देश्य यह है कि गुण को जानकर हम अपने जीवन में उसे ग्रहण करें, उनका संग्रह करें और दोषों को जानकर उसका परित्याग करें ।

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